मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के छोटे से शहर अजीतगढ़ की रहने वाली रमा बाई को प्रसव -पीड़ा शुरू होने पर पास के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पर ले जाया गया, जहां उसे बेड उपलब्ध कराना तो दूर उसे चद्दर भी नहीं दी गयी जिसे कॉरिडोर में बिछाकर लेट सके और न ही वहां समय पर डॉक्टर उपलब्ध थे जिसके कारण रमाबाई ने अत्यधिक प्रसव पीडा के कारण वही पर दम तोड़ दिया।
रमा बाई की यह कहानी ग्रामीण भारत में प्रत्येक दिन देखी जा सकती जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की खामियाँ स्पष्ट नजर आती हैं। हाल ही में एक वैश्विक रिपोर्ट " ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजिज स्टडी" जो लॉसेंट विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुयी में भारत की रेक 195 देशों में से 154वीं हैं, इसमें भारत अपने पड़ोसी देशों से भी पिछड़ता हुआ नजर आ रहा हैं। जो भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली की गंभीर स्थितियो को बयां कर रही है। जिसके कारण लोगो को मजबूरन निजी स्वास्थ्य सुविधाओं का सहारा लेना पड़ता है, जो उनके आर्थिक बोझ को बढ़ाता है साथ ही वंचित वर्गों को स्वास्थ्य सुविधाओं दूर करता है।
भारत में स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली का सुदृढ़ीकरण करने के लिए कई बार निजीकरण पर चर्चा की जाती हैं, लेकिन देश की काफी जनसंख्या सामाजिक, आर्थिक व अन्य कारणों से निजी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेने में असक्षम हैं, साथ ही एक लोककल्याणकारी राज्य का यह दायित्व बनता है कि देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा का मजबूत आधारभूत ढांचा तैयार करे जिसमें कोई भी व्यक्ति आसानी व शीघ्र स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सके ।
स्वास्थ्य सुविधाओं की दृष्टि से वर्तमान में देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली का बुरा हाल है, वही दूसरी ओर निजी अस्पतालों में निरन्तर सुविधा का विस्तार जारी हैं, जिससे लोगों का रुझान इस तरफ बढ़ रहा है। चौथे राष्ट्रीय परिवार और स्वास्थ्य सर्वे के मुताबिक, 56 फीसदी शहरी व 49 फीसदी ग्रामीण लोगों ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं का विकल्प चुना है। अत: देश की स्वास्थ्य सुविधाओं में सार्वजनिक व निजी दोनों की भूमिका की जांच करने की आवश्यकता हैं।
सर्वप्रथम भारत में स्वास्थ्य देखभाल के सुदृढ़ीकरण में निजीकरण ही एकमात्र समाधान नहीं है के दृष्टिकोण से देखे तो देश की आज भी 50 फीसदी ज्यादा आबादी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर निर्भर हैं, जिसमें 22% से अधिक गरीबी रेखा से नीचे की श्रेणी में आते हैं, जो निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं ले सकते हैं।
वर्तमान में देश की संवृद्धि दर बिना रोजगारों में वृद्धि के बढ़ रही हैं, जिसके कारण प्रतिव्यक्ति आय कम, गरीबी में वृद्धि से भूखमरी व कुपोषणकी समस्याओं में वृद्धि हो रही हैं, जिनका सस्ता व समग्र इलाज 'सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली' में ही वहनीय हैं।
भारत एक लोकतंत्रात्मक देश है, जहां 'संविधान लोगों को राज्य से आधारभूत सुविधाओं की मांग की गांरटी देता हैं, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A में मौलिक अधिकार तथा अनुच्छेद 49 में राज्य नीतिनिर्देशक तत्वों में इनका प्रावधान है। जहां निजीकरण की आवश्यकता अनिवार्य नहीं है।
निजी स्वास्थ्य सुविधा आम आदमी के बजट से बाहर हैं, साथ ही एक महंगी प्रणाली है जहां पूंजीवादी सिद्धांत व्यवहार में दिखाई देता है कि 'जिसकी जितनी आर्थिक क्षमता है वह सेवाओ का उतना ही अधिक उपयोग कर सकता है।'
वर्तमान में ऐसे कई उदाहरण सामने आए जहां कोविड 19 के दौरान निजी स्वास्थ्य सुविधाओं की 'नैतिकता' पर सवाल उठाये जा सकते हैं जैसे- यदि मरीज के पास इलाज के पैसे न हो तो आपातकालीन परिस्थितियों में भी इलाज करवाना मुश्किल हो जाता है। साथ ही मामूली सी बीमारियों में भी अपने हितों की पूर्ति के लिए महंगे इलाज की सलाह दी जाती हैं तथा कई बार महंगे बिल थमा दिए जाते हैं ।
वैश्विक तुलना के आधार पर भी निजीकरण के खिलाफ तर्क दिए जा सकते हैं कि यूरोपीय राष्ट्र विकसित राष्ट्र है, फिर भी सरकार द्वारा 80-90 फीसदी स्वास्थ्य खर्च वहन किया जाता है। थाइलैण्ड में स्वास्थ्य सुविधाओं की 100 फीसदी गांरटी संवैधानिक रूप से सार्वजनिक सुविधाओं के माध्यम से प्रदान की गयी है ।
देश में वर्तमान में शिशु मृत्यु दर 40/1000 जीवित बच्चो पर तथा मातृत्व मृत्यु दर 167/1 लाख जीवित बच्चों पर माताओं की मृत्यु काफी उच्च है, जिसकी जिम्मेदारी देश की सरकार पर है, निजी क्षेत्र इन समस्याओं को व्यापकता से हल करने में असमर्थ होगा क्यों कि सम्पूर्ण देश में इन समस्याओं का समाधान एक उपयुक्त सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति से ही संभव है एवं आर्थिक संसाधनो का जुटाना निजी क्षेत्र के लिए असंभव होगा ।
देश में अधिकांश निजी स्वास्थ्य सुविधाएं शहरों में स्थित है, क्यों कि गांवों का आधारभूत ढांचा कमजोर होने के कारण एवं आर्थिक लाभ की कम संभावनाओ के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इनकी पहुंच सीमित हैं।
देश की अधिकांश सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाएं सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रो पर निःशुल्क उपलब्ध है, जिसका देश की 70% फीसदी से अधिक आबादी को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ प्राप्त होता है एवं निजीकरण से हमेशा के लिए स्वास्थ्य महंगा हो सकता है एवं सार्वजनिक योजनाओं के क्रियान्वयन की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
वर्तमान में तकनीकी विस्तार के कारण सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं में आसानी से विस्तार संभव है शहरों में स्थित एम्स जैसे अस्पताल की सुविधाएं ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराना आसान भी हैं, कई राज्यों सरकारों के स्वास्थ्य उत्कृष्ट मॉडल को देखा जा सकता जा सकता है जैसे- राजस्थान में मुख्यमंत्री निःशुल्क दवा योजना' व निःशुल्क स्वास्थ्य जांच योजना का सफल क्रियान्वयन यह बताता है कि सस्ता इलाज सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आसानी से संभव हैं।
दूसरी ओर स्वास्थ्य सुविधाओं में निजीकरण के पक्ष में तर्क की बात की जाए तो सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का पिछड़ापन जैसे अस्पतालो में मरीजों की संख्या अधिक होने के कारण बेडो (बिस्तरों) की कमी, गंदगी का वातावरण, स्वास्थ्य सेवाओं का निम्नस्तर आदि है।
निजी क्षेत्र सेवाओं को व्यापक रूप उपलब्ध करा सकता है जैसे स्वास्थ्य की आधुनिक सुविधाओं की उपलब्धता एवं निजी क्षेत्र में प्रबंधन उच्च श्रेणी का होता है एवं स्वास्थ्य सेवाओं की उच्च गारटी होती हैं ।
निजीकरण से विदेशी निवेश भी आकर्षित हो सकता जिससे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार दूर ग्रामीण व पहाड़ी क्षेत्रों में भी संभव हो सकता है जहां आधुनिक तकनीक व इंटरनेट की सहायता से सस्ता इलाज उपलब्ध करवाया जा सकता है।
स्वास्थ्य बीमा के प्रति बढ़ती जनजागरूकता व सरकारी सस्ता बीमा सुविधा आम नागरिकों को लगभग मुफ्त में निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध करा सकती हैं। जैसे - आयुष्मान भारत बीमा स्कीम !
निजीकरण से सरकार पर वित्तीय व प्रबंधन भार कम होगा, जिससे सरकारी धन की लिकेज की समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता हैं।
वर्तमान में सरकार द्वारा स्वास्थ्य सुविधाओं व रिसर्च एंड डवलपमेंट पर कुल सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.4 %फीसदी खर्च किया जाता है जो वैश्विक औसत 5 फीसदी से काफी कम हैं। जब कि निजीकरण से इसे ओर बढ़ाया जा सकता है।
हाल ही के व्यवहारिक उदाहरणों में देखा गया है कि निजीकरण आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं व त्वरित इलाज में सार्वजनिक क्षेत्रों की तुलना अधिक दक्षपूर्ण हैं।
वही इन समस्याओ के समाधान पक्ष की बात की जाए तो आधुनिक समय में ऐसे कई उदाहरण है जहां सरकारी व निजी क्षेत्र सफलतापूर्वक एक साथ कार्य कर रहे हैं, जैसे- सार्वजनिक निजी भागीदारी (PPP) मॉडल द्वारा सड़कमार्ग, रेलमार्ग व पुलों आदि का सफलता पूर्वक निर्माण व क्रियान्वयन किया जा रहा हैं।
हाल ही में नीति आयोग द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में जिला स्तर के अस्पतालों में सार्वजनिक - निजी भागीदारी का मॉडल प्रस्तुत किया जहां सरकारी अस्पतालों में निजी पेशेवरों के कार्य करने संबंधी योजना पर विचार किया जा रहा है, इससे एक तरफ सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य क्षेत्र में विशेषज्ञो व नर्स स्टाप की पूर्ति की जा सकेगी वही दूसरी ओर आम जनता को सस्ता व तीव्र इलाज संभव हो सकेगा।
बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दोनो सार्वजनिक व निजी क्षेत्रों को देश के स्वास्थ्य क्षेत्र के अनुकूल रणनीतियों पर कार्य करना होगा।
वर्तमान में देश में स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.4% खर्च किया जाता है, क्योंकि देश संसाधनों का अभी भी काफी अभाव है, साथ ही जो पैसा खर्च किया जा रहा वह भ्रष्टाचार के कारण लिकेज हो रहा है, जिसके कारण स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति नहीं हो पा रही हैं, इसमें सरकार व निजी क्षेत्रों दोनों को स्वास्थ्य क्षेत्र के 'रिसर्च व डवलपमेट' पर निवेश करने की आवश्यकता है।
'स्वास्थ्य बीमा' के प्रति लोगों में जनजागरूकता लाना ताकि स्वास्थ्य सुविधाओं का बोझ आम आदमी की जेब पर न हो, इस दिशा में हाल में द्वारा भारत सरकार कई योजनाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वयन किया जा रहा है, जैसे- प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना एवं 'आयुष्मान भारत' आदि ।
योजनाओं का सही व सफल क्रियान्वयन के लिए वास्तविक लाभार्थी की पहचान करना भी अति आवश्यक है जिससे भ्रष्टाचार को रोककर पारदर्शिता व जवाबदेयता सुनिश्चित की जा सके, इसके लिए सरकार आधार कार्ड व तकनीकी प्रावधानों की सहायता से योजनाओं का सही क्रियान्वयन का प्रयास कर रही हैं।
देश की आबादी का आज भी 70% भाग ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों का बुरा हाल हैं, यहां तक कि सामान्य इलाज के लिए भी लोगों शहरों में जाना पड़ता है। देश के दूरदराज पहाड़ी, जनजातिय, व अन्य दुर्गम स्थानो पर स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए विज्ञान व प्रौद्योगिकी का सहारा लिया जा सकता है, जैसे:- गांवो व जनजातीय क्षेत्रों में इंटरनेट आधारित ई-टेलीमेडिसन, मोबाइल एंबुलेस एवं आपातकालीन स्थिति में एयर एम्बुलेंस की व्यवस्था की जा सकती हैं।
देश में स्वच्छता व स्वास्थ्य के मुद्दों पर विशेष ध्यान देते हुए देश में स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है, जिससे एक तरफ बीमारियों से निजात मिलेगी दूसरी ओर जीवन गुणवत्ता में भी सुधार आएगा।
भारत सरकार द्वारा योग को आम जीवन शैली से जोड़ने के लिए एक अलग से "आयुष मंत्रालय" का गठन किया गया है जो परम्परागत स्वास्थ्य ज्ञान व विज्ञान के साथ-साथ योग को बढ़ावा दे रहा है, इससे निश्चित रूप से बीमारियों को कम किया जा सकता है, एवं स्वास्थ्य सेवाओं के खर्च में कमी आएगी।
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